Wednesday, January 17, 2018

झत्त (डॉ. चंचल भसीन)

                                       “झत्त
उट्ठदे गै बड्डलै 
जिंदगी कन्नै 
होई गेई झत्त,
दिक्खेआ बड़े गै कोला,
कम्मै आह्ली दे मुंहै’ पर
मायूसीथकावट,
चैंता-झूरे। 
पर कुसैगी अपनी,
थकावटमायूसी,
चैंता-झूरें नै 
करदी नेईं
मायूस,
औंदे गै,
भरदी अपने अंदर 
फुर्ती,
कम्मै गी झटपट 
जुटी,
मकाई-समेटियै 
ते 
देई जंदी सभनें दे
चेहरें ‘पर 
ख़ुशी
अनसम्भा पेआर,
फ्ही 
लेई जंदी
अपने लेई
थकावटमायूसी,
चैंता ते झूरे।
                              (डॉ. चंचल भसीन)

Wednesday, February 22, 2017

"आख़िर क्यों" ( डॉ. चंचल भसीन )

    "आख़िर क्यों"

आख़िर क्यों हर बार

मुझे ही दीवारों की

चार-दीवारी में बाँधा गया?

क्यों रिवाजों की ज़ंजीरों 

से झकड़ा गया?

क्यों अपनी इज़्ज़त की 

दुहाई देकर

जिमीं में दबा दिया?

जब आया बंश ख़तरे में

तो.........

अब बंश बचाने की 

ख़ातिर 

लपेटा जा रहा मुझे 

रंगीन सपनों में

गढ़े जा रहे क़सीदे 

सशक्तिकरण के

सदियों से माना है 

औरत

शक्ति का प्रतीक

तरस मत खाओ

अब मुझ पर

हक़ मुझे लेना आता है

बस काँटे मत बिछाओ 

मेरी राहों में।

 ( डॉ. चंचल भसीन )











Sunday, December 25, 2016

"हीखी" ( डॉ. चंचल भसीन )

"हीखी"

ड़ियोढी बैठी दी 

निम्नोझानी

औंदे-जंदे गी दिक्खदे

सड़कै उप्पर 

नज़र ताड़े दे

केईं क्रोह् पैंडा 

रोज़ करी जंदी

औंदे दा मुँह ते जंदे दी पिट्ठ

बस्स 'यै दुनिया हून।

रूकी गेदी  

पैरें दी रफ़्तार 

बज्झी गेदे भित्तै गी

जंदरे आंगर

ख़ाली कमरें ते 

सुन्न-मसान बेह्ड़ा 

खाने गी पौंदा  

दलकदा  

धरूकदा

लहू-लुहान करदा  

पर खन्दा नेईं

सैह्कने लेई रखदा

उंदे लेई 

जेह्ड़े उड्डरी जाई बैठे  

अपने बक्खरे आह्लड़े

पर फ्ही बी रौंह्दी

चैंता, झूरे, फ़िकर 

उंदे बद्धने मठोने दी,

जि'नेंगी बलगदियां

एह् हिरखी अक्खीं।

( डॉ. चंचल भसीन )


"हीखी" ( डॉ. चंचल भसीन )

"हीखी"

ड़ियोढी बैठी दी 

निम्नोझानी

औंदे-जंदे गी दिक्खदे

सड़कै उप्पर 

नज़र ताड़े दे

केईं क्रोह् पैंडा 

रोज़ करी जंदी

औंदे दा मुँह ते जंदे दी पिट्ठ

बस्स 'यै दुनिया हून।

रूकी गेदी  

पैरें दी रफ़्तार 

बज्झी गेदे भित्तै गी

जंदरे आंगर

ख़ाली कमरें ते 

सुन्न-मसान बेह्ड़ा 

खाने गी पौंदा  

दलकदा  

धरूकदा

लहू-लुहान करदा  

पर खन्दा नेईं

सैह्कने लेई रखदा

उंदे लेई 

जेह्ड़े उड्डरी जाई बैठे  

अपने बक्खरे आह्लड़े

पर फ्ही बी रौंह्दी

चैंता, झूरे, फ़िकर 

उंदे बद्धने मठोने दी,

जि'नेंगी बलगदियां

एह् हिरखी अक्खीं।

( डॉ. चंचल भसीन )


Friday, December 9, 2016

"हिखी" ( डॉ. चंचल भसीन )

  "हिखी"

ड़ियोढी बैठी दी 

निम्नोझानी

औंदे-जंदे गी दिक्खदे

सड़कै उप्पर 

नज़र ताड़े दे

केईं क्रो पैंडा 

रोज़ करी जंदी

औंदे दा मुँह ते जंदे दी पिट्ठ

बस्स 'यै दुनिया हून।

रूकी गेदी  

पैरें दी रफ़्तार 

बज्झी गेदे भित्तै गी

जंदरे आंगर

ख़ाली कमरें ते 

सुन्न-मसान बेह्ड़ा 

खाने गी पौंदा  

दलकदा  

धरूकदा

लहू-लुहान करदा  

पर खन्दा नेईं

सैह्कने लेई रखदा

उंदे लेई 

जेह्ड़े उड्डरी जाई बैठे  

अपने बक्खरे आह्लड़े

पर फ्ही बी रौंह्दी

चैंता, झूरे, फ़िकर 

उंदे बद्धने मठोने दी,

जि'नेंगी बलगदियां

एह् हिरखी अक्खीं।

( डॉ. चंचल भसीन )




Tuesday, September 20, 2016

"क़ैद"

तुम बिन तन्हाई की 
कोठरी में क़ैद हूँ 
तुम आओ 
मुझे आज़ाद कर दो। 
 ( डॉ. चंचल भसीन )

Friday, September 16, 2016

ख़ामोशी- डॉ. चंचल भसीन

आओ

आज इस ख़ामोशी को 

तोड़कर 

उस मोहब्बत--जां में 

चलें

यहाँ बातें तुम करो

मैं सुनूँ

और

कुछ बातें मैं करूँ 

और 

तुम सुनो!

शब्दों के गूढ़ार्थों को

समझे,

उसमें समाएँ,

हो गिला किसी बात का

फ़ुरसत के लम्हों को 

सँवारे,

बे दखल होकर!

आत्माओं को तृप्त करें 

रहे कोई तृष्णा 

पुर्नजन्म की!

(डॉ. चंचल भसीन)

Friday, June 24, 2016

"याद" (डॉ. चंचल भसीन)

  "याद" (डॉ. चंचल भसीन)
तुम याद आए, बहुत याद आए
जब सूरज ने दी दस्तक  
खिड़की दरवाज़े से अंदर झाँका 
चुपके से कानों में 
कहा गुड मोर्निंग 
तुम याद आए, बहुत याद आए।
तेरे बोल मेरे कानों में गूँजने लगे
मुझे तेरी यादों में भिगोने लगे 
जब इंतज़ार करने पर 
आया न कोई संदेशा 
तुम याद आए बहुत याद आए
पर दिल न माने के 
तुम न आओ गए
दिन निकला उदासी में 
दिल में दहके अंगारे 
शाम होते 
सूरज भी निकल पड़ा अपने
पड़ाव की ओर 
छोड़ अंधेरे में तड़पता मुझे तब
तुम याद आए बहुत याद आए
    ( डॉ. चंचल भसीन )



Wednesday, May 25, 2016

दुआसी ( डॉ. चंचल भसीन )

दिन निकली जा, 
रौले-रप्पे,
जक्को-तक्के, 
संझ घरोंदे,
भित्त ठ्होरै ते 
आई पुजदी,
मेरी साथन, 
मेरी अपनी,
मेरी दुआसी,
बस्स दुआसी,
छड़ी दुआसी!
(डॉ. चंचल भसीन)

Thursday, May 19, 2016

Book released function





Dogri Sanstha released book
"Antakaran Di Qaid" #writer# Smt. Santosh Sangra, 
Chief Guest # Mr. Pravez Dewan
Presided over the function# Prof. Veena Gupta, 
The literary function , conducted by Dr. Chanchal Bhasin , Literary secretary of Dogri Sanstha 

Friday, May 13, 2016

आवाज़

छुप जाते हो आवाज दे कर 
आँखों से दूर 
पर दिल में तो 
कस्तूरी को तरह बसे हो।        
  (डॉ. चंचल भसीन)

Saturday, April 30, 2016

सफ़र

"सफ़र तय करते-करते उम्र गुज़र चली है,
मंज़िल अभी भी आँख-मिचौली कर रही है।"
                    (डॉ. चंचल भसीन)

Thursday, March 24, 2016

"असर" (डॉ. चंचल भसीन)

"असर"
समझ न पाऊँ 
क्यों तेरे दीदार को 
तरसे आँखें
पता है जब के 
तूनें बदल लिया है रास्ता। 
यह तेरी मोहब्बत का 
असर है शायद
झूठी ही सही 
पर जब की थी 
उसमें कहीं पहनावा 
असली पहना था तुमनें। 
   (डॉ. चंचल भसीन)
"ग़लतियाँ मुझसे भी हो सकती है, 
पर मैं ग़लतियों का पुतला नहीं हूँ।"
             (डॉ. चंचल भसीन)

Wednesday, March 16, 2016

"वायदों से इरादों का
अंदाज़ा गर हो जाए तो
मुश्किलें सुलझ जाएँ।"
     (डॉ. चंचल भसीन)

Monday, March 7, 2016

"उड़ान" ( डॉ. चंचल भसीन )

       "उड़ान"
खुले आसमान पर पंखों को फैलाती 
अपनी आग़ोश में लेने की चाह
और ऊँचा ले जाते उसे 
ऊपर-नीचे पलटे खाती 
ग़रूर में 
कईं आगे-पीछे मँडराते पंछी
पकड़ना चाहते भी  
किसी की भी पकड़ में नहीं 
पंछियों की भी होड़ 
हर एक उसका दीवाना
घूरती निगाहें 
उसकी रफ्तार 
और भी तीव्र कर देती
कुछ उसके संग खेलते 
हठखेलियां करते-करते
पर न जाने कब 
शातिर बाज़ के चंगुल में फंसकर
दीवानी हो गई
उसकी बातों के जाल
कब जकड़ गए 
समझ न सकी,
क्यों उसके पंखों को 
संबारने की बजाए 
कतरना चाहा
अपने अहम के लिए
अब यह बिलखती ज़िंदगी
उड़ना चाहती है खुले अासमान 
बिना सहारा तलाशे
पहली सी उड़ान।
   ( डॉ. चंचल भसीन )

Monday, January 25, 2016

"चाहत" ( डॉ. चंचल भसीन )

    "चाहत"
तेरे दिल में रहकर भी क्यों तन्हाई में रहूँ,
मैंने तो तुम्हें चाहा 
तू वायदों का बादशाह 
तेरे वायदे फिसलते पत्थरों जैसे.....!
तेरे अपने कहे 
अक्षरों को ही टिकने नहीं देते।
वो फिसलते मोहब्बत के 
अक्षरों की पीड़ा 
तू न जाने कितना दर्द देती है?
छीन ली आँखें, 
कर दिया अंधा,
जुबां से गूँगा, 
कानों से बहरा
दिमाग़ की हरकत बंद,
अधमरी सी देह 
न जाने फिर भी क्यों?
उम्मीद लिए 
रास्ते निहारती,
सम्पूर्णता पाने की चाह की तड़प 
मुझे ज़िंदा रखे है।
   ( डॉ. चंचल भसीन )