Sunday, June 28, 2015

इंतजारी ( डॉ. चंचल भसीन )

गुज़र रहे है 
इंतजारी में दिन सकून से
यही वजह है ज़िंदा रहने की। 
      ( डॉ. चंचल भसीन )

Tuesday, June 23, 2015

हुनर ( डॉ. चंचल भसीन )

तुझमें हुनर की कमी नहीं, 
तू बेईमानी भी बड़ी ईमानदारी से करता है 
और एक हम हैं कि 
ईमानदारी में ही मात खा जाते है। 
        ( डॉ. चंचल भसीन )

Wednesday, June 17, 2015

हे मानव ! 
मत इतराह इतना अपनी बुलंदी से,
कि वक़्त तुम्हारा है, 

हमने तो हाथों की बंद मुट्ठी से, 
वक़्त को फिसलते देखा है।

समुंद्र की लहरों को चीरने वालों को,
किनारों में डूबते देखा है। 

दूसरों का सहारा वनने वालों को ही
 बे-सहारा होते देखा है। 

खुल जाते है क़िस्मत के बंद दरवाज़े,
क़िस्मत को भी बदलते देखा है।
       ( डॉ. चंचल भसीन ) 








Friday, June 12, 2015

                       "ज़िंदगी"
         ज़िंदगी दी बी अजीब क्हानी ऐ, 
         कुसै लेई रानी ते कुसै लेई घाह्नी ऐ।

         नित-रोज दसदी, एह् अपने गै रंग,
         बज्जे दे आं ऐसे जे छुटदे नेईं फंग।

         करी-करी हीलें इसी रोज मनाने,
         रुस्सी-रुस्सी बौंह्दी जि’यां निक्के ञ्यानें।
 
        असेंगी बनाया इन्न निरा मशीन ऐ,
         फ्ही बी नेईं आंदा कदें इसगी जकीन ऐ।
        
        सारी उमर करान्दी एह् साढ़े’शा चाकरी,
        हुकम चलान्दी बनी साढ़े पर लाकड़ी।
         
        मनेआ जे जिन्दगी दा इ’यै दस्तूर ऐ,
        जि’यां पवै भोगना उ’यां गै मंजूर ऐ।                         
                 ( डॉ. चंचल भसीन )