Sunday, April 5, 2015

वो मेरा कभी था ही नहीं पर 
मुझे हमेशा ऐसा लगा कि मैं उसकी हूँ। 
          ( डॉ. चंचल भसीन )

Wednesday, March 25, 2015

एहसास ( डॉ. चंचल भसीन )

          एहसास
ज़िंदा होने दा एहसास होना चाहिदा
जिसकरी लिखन लगनीं
माहनू पर शंगारक कवता
जेह्डा छल-छलिद्दर/कपट, झूठ-जूठ, मार-कटाई,
हिंसा-भ्रष्टाचार कन्नै भरे भरोचे दा ऐ
बड़ा शैल लगदा,
दिखने गी
सभनें गी अपनी बक्खी खिचदा ऐ,
मनमोह्दा 
सारेंगी अपने चबक्खै बठाई रखदा ऐ
जिसलै उसदा मुआंदरा तुआरनियां,
सारी खूबियें कन्नै
ख़ूबसूरत उतरदा ऐ, 
खिड़खिड़ हसदा ऐ
सफ़ेदपोश बड़े ख़ुश होंदे न
हत्थ लुआरी-लुआरी वाह-वाही करदे न
पता नेईं चलदा कुसलै
कि मेरी का'न्नी गी भन्नी दिंदे न
सारी स्याही काकलै पर डोली ओडदे न
जिसी दिक्खी बड़ा घटोनी
जे इ'यो ते ऐ ओह् मुआंदरा?
फ्ही कि नेईं मनदे।
        ( डॉ. चंचल भसीन )

Sunday, March 22, 2015

एहसास ( डॉ. चंचल भसीन )

ज़िंदा होने का एहसास होना चाहिए
जिस कारण लिखने लगती हूँ
मनुष्य पर श्रृंगारिक कविता
छल-कपट, झूठ-जूठ, मार-कटाई,
हिंसा-भ्रष्टाचार से जो भरपूर है
बहुत अच्छा लगता है
दिखने में 
सबको अपनी ओर अकर्षित करता है 
मनमोहक 
अपने आस-पास बिठाए रखता है
जब उसका चेहरा उतारती हूँ
पन्नों पर 
सभी ख़ूबियों के साथ
ख़ूबसूरत उतरता है
सफ़ेदपोश बड़े ख़ुश होते हैं
हाथों को उछाल-उछाल कर 
वाह-वाही करते हैं
पर पता नहीं चलता 
कब और क्यों?
मेरी क़लम को क़ैद करके
सारी स्याही पन्नों पर उडेल दी जाती है।
जिसे देखकर बड़ी घुटन महसूसती हूँ 
कि यही तो है वो चेहरा
फिर मानते क्यूँ नहीं ?
           ( डॉ. चंचल भसीन )

Wednesday, March 18, 2015

मन चंचल ऐ ( डॉ. चंचल भसीन )

मन चंचल ऐ
उड़दा फ़िरदा
नेईं समींदा
नेईं पतींदा
करदा अड़िया
लांदा झड़ियाँ 
राड़-बराड़ करदी रौह्नी 
एह्दे'नै लग्गी रौह्नी 
सोचा फ्ही
मन चंचल ऐ।
बौंह्दा फ्ही जाईं
उच्ची टिसी
चांह्दा दुनिया'नै मिलना
दिक्खदा जिसलै छलदी दुनिया
लगदा खिंझन
मिगी खंझान
एह्दे'नै मिं बड़ी परेशान
सोचा फ्ही
मन चंचल ऐ।
जद् दिक्खै मिं निम्मोझान
होंदा फ्ही एह् परेशान 
गले'नै लांदा मिं पतेआंदा 
बनदा साह्रा
होंदा गुज़ारा 
सोचा फ्ही 
मन चंचल ऐ।
( डॉ. चंचल भसीन ) 
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Saturday, March 14, 2015

"शब्द" ( डॉ. चंचल भसीन )

शब्दों की बस्ती में गुम हूँ, 
यहाँ बेशुमार शब्द पड़े हैं
पर उलझे हुए 
शब्दों के अर्थ नहीं मिलते मुझे,
जो अपने अर्थ खोते जा रहे हैं,
उन्हें ढूँढने की 
कोशिश में हूँ।
सुना है शब्दों में रिश्तों की कशिश है,
प्रेम-प्यार की गर्माहट है,
यह सब हैं कहॉं?
जो हैं मुझे
थके-थके से लगते हैं।
जो अपनी एहमियत चाहते हैं, 
छटपटाते दिखते हैं
हाँ, इन्हें ही समेटना चाहती हूँ, 
पर मेरे हाथों से क्यूँ 
फिसलते जा रहे हैं,
क्या, इन्हें भी आदत हो गई है
बे-तरतीव रहने की,
थक गई हूँ सोचते-सोचते
अब मेरे सामने बेढंगे शब्द
मुझे खिंझा रहे हैं, हस रहे है
बेवस हूँ नहीं समझ पा रही
यह सब क्या है?



Wednesday, March 11, 2015

अकसर वो हमसे उम्मीद रखते हैं
पर ख़ुद कभी खरे उतरे नहीं। ( डॉ. चंचल भसीन )

Sunday, February 22, 2015

हाथों की धुँधली लकीरें 
कहाँ ले जाएँगी?
जीवन में प्रश्नचिन्ह लगा देती हैं। 

Friday, February 6, 2015

जिस नींद से थी मेरी गहरी दोस्ती अब वो मेरा कहा नहीं मानती 

@DailyExcelsior1 Dogri novels depict critical issues-O P Sharma


Thursday, December 18, 2014

Dogri Sanstha pays tributes to Verinder Kesar - Early Times Newspaper Jammu Kashmir

Dogri Sanstha pays tributes to Verinder Kesar - Early Times Newspaper Jammu Kashmir

Guv releases book in Dogri

Guv releases book in Dogri

Governor releases ‘Dogri Upnayasein Ch Varg Sangarsh’ - JK Newspoint Newspaper Jammu Kashmir

Governor releases ‘Dogri Upnayasein Ch Varg Sangarsh’ - JK Newspoint Newspaper Jammu Kashmir

Governor releases “Dogri Upnayasein Ch Varg Sangarsh” - Journey Line Newspaper

Governor releases “Dogri Upnayasein Ch Varg Sangarsh” - Journey Line Newspaper

Wednesday, November 19, 2014

घटना

आज मेरे साथ एक घटना ऐसी घटित हुई कि जिसे पढ़कर थोड़ी देर के लिए आप भी दंग रह जाएँगे बहुत ही पढ़ी-लिखी अध्यापक जो पढ़ाई-लिखाई के मामले में तो अव्वल पी.एच.डी. पर दिमाग़ से शून्य। यह मेरा ख़्याल है आप भी अपना अंदाज़ा लगा सकते है कि उसका सामान्य ज्ञान कितना है और किस सदी में रह रही हैं--

बात यूँ शुरू हुई कि स्कूल में किसी अध्यापक के पर्स से पैसे चोरी हो गए तो सभी इसी चिंता में की आए दिन कभी बच्चों के, कभी अध्यापकों के पर्सों से पैसे चोरी होते रहते हैं, ऐसा क्यूँ? इसे कैसे रोका जाए, क्या क़दम उठाए जाएँ, बगैरा-बगैरा। सभी चिंतित थे। बातों-बातों में एक अध्यापक ने कहा कि यह समस्या तक़रीबन सभी शिक्षा संस्थानों की है चाहे सरकारी हों या निजी। ऐसी घटनाएँ नित-प्रतिदिन होती रहती हैं तो इस अध्यापक का सामान्य ज्ञान देखकर मैं दंग रह गई। आप भी मुझ से सहमत होंगे। उसका कहना था ," Actually मैम Schedule Caste बच्चे पढ़ते हैं न इसलिए।" उसकी बात सुनकर एक क्षण के लिए मैं उसे देखती रह गई कि क्या वोला है उसने। मैंने उसकी बात को काटते हुए ग़ुस्से से पूछा," मैम यह कैसे कि Schedule Caste बच्चे पढ़ते हैं तो चोरी होती है इसे थोड़ा बताएँगी।" इसकी बात मेरी आपे से बाहिर थी। मेरा यूँ पूछना उसे लगा कि ग़लत जगह यह बात कही है। ऐसे बेशर्म हो गई कि मूहं इधर-उधर करने लगी। कोई उत्तर न दे सकी। बात को वहीं पर छोड़कर दुबारा उसी मुद्दे पर बात करने लगे विना कोई हल निकले छोड़ दिया।

"मैं आप सबसे एक प्रश्न करना चाहूँगी कि अगर समाज के निर्माता ऐसे होंगे तो हमारी आने वाली पीढ़ी, कब ऐसे जात-पात, ऊँच-नीच के बंधनों से मुक्त हो पाएगी।"

घर आने पर भी मुझे उसके द्वारा कही गई बात मेरे कानों में गूँज रही थी। सोचा क्यों न इसके लिए तत्थें ढूँढे जाएं, "क्या वास्तव में ऐसा है कि Schedule Caste बच्चे चोरी करते हैं?" पर मुझे कहीं से भी ऐसी कोई जानकारी नहीं मिल सकी अगर आप के पास कोई ऐसे सही तत्थें हैं तो कृपा करके मुझे ज़रूर भेजे ताकि मैं भी अपने ज्ञान में बढ़ोतरी कर सकूँ।

Tuesday, November 11, 2014

@bhasin_dr: मेरा मुस्कुराना किसी के  दुख की वजह न बने, इसलिए मुस्कुराना छोड़ दिया।

Tuesday, October 28, 2014

अच्छे पल

"अच्छे पलों की यादें मन प्रफुल्लित करती हैं पर जिन के कारण पल हसीन थे उनकी याद आने पर मन विचलित हो जाता है"